सीवान का राजेंद्र कुष्ठाश्रम अपनी बदहाली पर बहा रहा है आँसू 

सीवान का राजेंद्र कुष्ठाश्रम अपनी बदहाली पर बहा रहा है आँसू 

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✍मैरवा से बरूनेश आनन्द वरुण की रिपोर्ट:

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मैरवा (सीवान)

कभी उत्तर भारत में अपनी पहचान रखने वाला राजेंद्र कुष्ठाश्रम आज अपनी बदहाली पर आॅसू बहा रहा है अब इसमें कुष्ठ रोगी भी नहीं रहे बदहाली के कारण मरीज़ अपनी भूख मिटाने के लिए कही और चले गए हैं महज़ कुछ ही यहां कभी-कभी आते हैं और फिर चले जाते हैं स्टेशन पूर्वी छोर के समिप वार्ड न0 10 में इनकी एक बस्ती है जिसमें दर्जनो अपने परिवार सहित निवास करते है वे अब कभी आश्रम में नहीं जाते अगल-बगल के गांवों-बाज़ारों में भीख मांगने पर मजबूर हैं भूखों मरने की नौबत से यहां के कर्मचारी एवं पदाधिकारी भी सालों से जूझते रहे हैं ज़िला मुख्यालय से 22 किमी पश्चिम प्रखंड मुख्यालय के निकटवर्ती हरिराम ब्रह्म मंदिर के एक किमी दक्षिण की ओर स्थित इस राजेंद्र सेवा आश्रम के उत्तरी सीमा पर एक मंदिर व विशाल फलदार वृक्षो का बागीचा है सट्टे बालिका इण्टर काॅलेज है सभी आश्रम की ही नीधी बतायी जाती है इस क्षेत्र को अनुग्रह नगर के नाम से जानते हैं आर्थिक संकट के कारण यह हरा-भरा क्षेत्र वीरान हो गया ।1953 में स्थापित इस सेवा आश्रम का उद्देश्य कुष्ठों की उपेक्षित जिंदगी को खुशहाल करना था. पैंतीस एकड़ में फैली कुष्ठों की इस दुनिया में जिंदगी जीने की तमाम सुविधाएं उपलब्ध थीं, लेकिन अब यहां सब कुछ चौपट दिखता है परमहंस बाबा राघव दास द्वारा स्थापित इस कुष्ठाश्रम का कार्यभार जब 10 मार्च 1954 को जगदीश दीन ने संभाला. तब उद्देश्य की पूर्ति बहुत तेज़ी से होने लगी. 27 अक्टूबर 1954 को तत्कालीन राष्ट्रपति डा. राजेंद्र प्रसाद ने इस आश्रम के भवन का शिलान्यास किया था.

         एक समय था जब इस संस्था के सेवा की चर्चा पूरे देश में होती थी. जिनकी छाया को देखकर लोग भागते थे, उन कुष्ठों के बीच दीन किस प्रकार रहे व कार्य किये यह देखने दूर-दूर से लोग आते थे. उनके व उनके कर्मचारियों की सेवा और लगन के कारण 1990 तक लगभग 9 हजार

कुष्ठ रोगियों को अपने रोग से मुक्ति मिली. 19 जनवरी 1981 को तत्कालीन राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्‌डी ने सर्जरी भवन का शिलान्यास किया. इस प्रकार 1954 से 1973 तक के 19 साल के स़फर में आश्रम ने अपने यहां नौ एसईटी सर्वे एजूकेशन ट्रीटमेंट यूनिटों की स्थापना की. तब यह राष्ट्र के सबसे बड़े कुष्ठाश्रम के रूप में जाना जाने लगा 1976 में इसे ट्रेनिंग सेंटर बनाया गया

जहां देश-विदेश से आए डाक्टरों को कुष्ठ रोग निवारण प्रशिक्षण दिया जाता था. इसका अपना ब्लड बैंक था और कुष्ठों को रोज़गार देने के लिए कई लघु उद्योग स्थापित किए गए थे.जिसमे हस्तकला, ऊन बुनाई, प्लास्टिक काम्पलेक्स, बढ़ईगिरी, सिलाई, वेल्डिंग, मोमबत्ती, वैशाली अभ्यास पुस्तिका निर्माण, कृषि औजार निर्माण, पत्ते की कटोरी का निर्माण प्रमुख था ये सभी लघु उद्योग उस समय सक्रिय थे.आश्रम को सबसे ज़ोरदार झटका 25 अक्टूबर 1987 को दीन के देहांत के साथ लगा सारी व्यवस्था चरमरा गई व विकाश गति अवरुद्ध हो गईं. देखते ही देखते कुछ महीनों में ही सभी 170 शय्याएं खाली हो गईं. यद्यपि इस संस्था को पहले सरकारी स्रोत से प्रतिवर्ष एससीटी गतिविधियों के लिए लगभग 42 लाख और उद्योग धंधों को चलाने के लिए 15 लाख रूपए मिलते थे. इसके अतिरिक्त उद्योग-धंधे से भी आय होती थी. विश्व स्वास्थ्य संगठन व राज्य सरकार से दवाइयां प्राप्त होती थीं. पर आज आश्रम में दवाइयां तो दूर रहीं. रूई-बैंडेज तक नहीं है सारण प्रमंडलीय तीन ज़िलों के ज़िलाधिकारी इस संस्था के पदेन उपाध्यक्ष हैं.जिले के वरीय पदाधिकारियो के अनुसार इस कुष्ठाश्रम के परिसर में मेडिकल कॉलेज के लिए निरीक्षण प्रतिवेदन राज्य सरकार को भेजा गया है. संस्था के सचिव विद्याभूषण तिवारी का कहना है कि राजेन्द्र कुष्ठाश्रम में मेडिकल कॉलेज व जनरल हॉस्पीटल खोलने के लिए पूरे आश्रम की डिजिटल फोटोग्राफी करायी गई है. उन्होंने बताया कि फोटोग्राफी की एक प्रति यूनिवर्सिटी ऑफ साउथ कैलिफोर्निया को भी भेजा गया है जिसमें कभी रोगियो सहित दर्शको का ताॅता लगा रहता था आज गीने -चुने आश्रम से जुङे कर्मि भरत पाण्डेय,योगेन्द्र उपाध्याय, राधेश्याम ओझा ,पारसनाथ तिवारी, बसिर अंसारी , धीरेन्द्र पाण्डेय, मदन प्रसाद, रामबाबु सहित चन्द बचे मरीज रामप्रवेश माधव बंगाली बाॅसफोर ही देख-रेख करते परिसर में मिलते है उस समय में बनी प्रबन्ध समिति सदस्यो की चर्चा ही यह दिखलाने के लिए काफी है की क्या मंशा रही होगी उन विभूतियो की समिति संरक्षक डाॅ राजेन्द्र प्रसाद,अध्यक्ष डाॅ अनुग्रहनारायण सिंह, उपाध्यक्ष जिलाधिकारी सारण, सचिव जगदीश दीन सहित तेइस सदस्य रहे।इसका पंजीकरण 11नवम्बर 1954 को सोसाइटी रजिस्टेशन एक्ट 1860 के अनुसार हुआ।27 अक्टूबर 1955 को राजेन्द्र प्रसाद ने पहला भवन अनुग्रह कुष्ट चिकित्साभवन का शिलान्यास किया जो आज भी हवाई माॅडल के रुप में प्रमुखता से खङा है।

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